Tuesday, September 29, 2009

जाने क्या ढूँढती रहती हैं ये आँखें मुझमे
राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है

अब न वो प्यार न उसकी यादें बाकी
आग यूँ दिल में लगी कुछ न रहा कुछ न बचा

जिसकी तस्वीर निगाहों में लिए बैठे हो
मअं वो दिलदार नहीं उसकी होओं खामोश चिता


… … जाने क्या ढूँढती रहती हैं ये आँखें मुझमें…
… राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है

जिंदगी हंस के गुज़रती तो बहुत अच्छा था
खैर हंस के न सही रो के गुज़र जायेगी

राख बरबाद मुहब्बत की बचा रख्खी है
बार-बार इसको जो छेदा तो बिखर जायेगी

… … जाने क्या ढूँढती रहती हैं ये आँखें मुझमें…
… राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है

आरजू जुर्म वफ़ा जुर्म तमन्ना है गुनाह
ये वो दुनीया है जहाँ प्यार नहीं हो सकता


कैसे बाज़ार का दस्तूर तुम्हें समझाऊं
बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता

… … जाने क्या ढूँढती रहती हैं ये आँखें मुझमें…
… राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है

—Sahir, Ludhiyanavi

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Simple and down to earth man who loves to be explicit in stating his mind. I have a strong secret desire to be able to serve the United Nations Organization some day!